अल्मोडा़ : वनाग्नि से हर साल होने वाले नुकसान को रोकने के लिए उत्तराखंड सरकार ने शीतलाखेत मॉडल को पूरे प्रदेश में लागू करने की योजना बनाई है. शीतलाखेत का जंगल, जो पिछले दो दशकों से वनाग्नि से पूरी तरह सुरक्षित है, अब पूरे प्रदेश के लिए एक उदाहरण बनेगा.
इसके तहत प्रदेश के सभी वन प्रभागों की 50-50 सदस्यीय टीमें एक-एक कर शीतलाखेत पहुंचेंगी और वहां के ग्रामीणों से वन संरक्षण के उपायों पर चर्चा करेंगी. इन उपायों को अन्य क्षेत्रों में भी लागू किया जाएगा.
ग्रामीणों की सामूहिक पहल से सफलता
शीतलाखेत के जंगलों को सुरक्षित रखने में आसपास के 30 गांवों के ग्रामीणों की भूमिका बेहद अहम है. 2004 में शुरू हुई इस मुहिम में ग्रामीणों ने सामूहिक प्रयासों से जंगल को आग और अन्य खतरों से बचाने का बीड़ा उठाया. महिला मंगल दल, युवा समूह और “जंगल के दोस्त” जैसे संगठनों की मदद से यहां के लोग किसी भी आग लगने की घटना पर तुरंत एकजुट हो जाते हैं. इन प्रयासों के कारण यह क्षेत्र अब घने जंगलों और वन संरक्षण का मॉडल बन चुका है.
शीतलाखेत मॉडल की मुख्य विशेषताएं
1. ग्रामीणों की जागरूकता: जंगलों की सुरक्षा के लिए 30 गांवों के लोग सामूहिक प्रयास करते हैं.
2. महिला मंगल दलों की भूमिका: महिला मंगल दल आग बुझाने और जंगलों की सुरक्षा में अहम योगदान देती हैं.
3. सूचना तंत्र का उपयोग: “जंगल के दोस्त” व्हाट्सऐप ग्रुप के माध्यम से सूचना मिलते ही ग्रामीण तत्काल कार्रवाई करते हैं.
4. हरे पेड़ों की कटाई पर रोक: ग्रामीण केवल सूखी लकड़ियों का उपयोग करते हैं.
5. औण दिवस का आयोजन: हर साल 31 मार्च से पहले खेतों का कूड़ा-कचरा निस्तारित कर आग लगने की संभावनाओं को खत्म किया जाता है.
राज्य में मॉडल लागू करने की योजना
शीतलाखेत मॉडल को अपनाने के लिए राज्य के सभी वन प्रभागों से 50-50 सदस्यीय टीमें अल्मोड़ा बुलाई जाएंगी. इन टीमों को शीतलाखेत क्षेत्र का दौरा कराया जाएगा, जहां ग्रामीण अपने अनुभव साझा करेंगे. इन उपायों को पूरे राज्य में लागू कर जंगलों को वनाग्नि और अन्य खतरों से बचाने का प्रयास किया जाएगा.
जंगलों में लौट रही हरियाली और वन्यजीव
ग्रामीणों के दो दशकों के प्रयासों से शीतलाखेत का जंगल न केवल घना हो गया है, बल्कि यहां दुर्लभ प्रजाति के वन्यजीव भी लौटने लगे हैं. यह मॉडल प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में भी वन संरक्षण के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है.
इस मुहिम में स्याही देवी, खड़किया, मटीला, सूरी, डाल, ज्यूड़, रैंगल जैसे 30 गांवों के करीब 900 ग्रामीण सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं. सरकार का यह प्रयास प्रदेश के जंगलों को बचाने और वन्यजीव संरक्षण में एक नई उम्मीद जगाता है.