देश में आर्थिक असमानता गहरी: 100 करोड़ लोगों के पास खर्च करने लायक पैसे नहीं, 10% लोग संभाल रहे इकोनॉमी..

देश की करीब 100 करोड़ जनता, यानी 90 फीसदी लोग, अपनी मर्जी से खर्च करने की ताकत नहीं रखते. ब्लूम वेंचर्स की स्टडी में दावा किया गया है कि ये लोग जरूरत के अलावा सामान या सुविधाएं नहीं खरीद सकते. वहीं, देश के केवल 10 फीसदी लोग, यानी 13-14 करोड़ लोग, जो मेक्सिको की पूरी आबादी के बराबर हैं, वो अर्थव्यवस्था को चला रहे हैं, क्योंकि ये लोग ही सबसे ज्यादा खर्च करते हैं और देश की तरक्की में बड़ा रोल निभाते हैं.

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ब्लूम वेंचर्स की इंडस वैली एनुअल रिपोर्ट 2025 में ये बात सामने आई है. इसमें कहा गया है कि टॉप 10% लोग देश की 57.7% कमाई कंट्रोल करते हैं जबकि बॉटम 50% की कमाई का हिस्सा 22.2% से घटकर 15% हो गया है. रिपोर्ट कहती है कि अमीर लोग और अमीर हो रहे हैं, लेकिन उनकी तादाद नहीं बढ़ रही. यानी जो पहले से पैसे वाले हैं, वो ज्यादा कमाई कर रहे हैं, लेकिन नए लोग इस ग्रुप में शामिल नहीं हो रहे हैं. इसके अलावा, 30 करोड़ लोग ऐसे हैं जिन्होंने हाल फिलहाल खर्च करना शुरू किया है. इन्हें ‘उभरते हुए’ या ‘इच्छुक’ ग्राहक कहा जा रहा है लेकिन ये लोग भी अपने खर्च को लेकर बहुत सावधान हैं.

खर्च करने वाला वर्ग बढ़ नहीं रहा!
रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि हाल के दिनों में लोगों की खर्च करने की ताकत कम हुई है, उनकी बचत भी तेजी से घट रही है और कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है. इस वजह से बाजार का तरीका बदल गया है और कंपनियां अब सस्ते सामानों की जगह प्रीमियम प्रॉडक्ट्स पर फोकस कर रही हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण रियल एस्टेट सेक्टर (Real Estate Sector) है, क्योंकि इसमें ये ट्रेंड साफतौर पर नजर आ रहा है. आंकड़ों के मुताबिक 5 साल पहले रियल एस्टेट की कुल बिक्री में अफोर्डेबल हाउसिंग की हिस्सेदारी 40% थी, जो अब घटकर महज 18% रह गई है.

भारत में ‘एक्सपीरियंस इकोनॉमी’ का जलवा
हाल ही में कोल्डप्ले और एड शीरन के कॉन्सर्ट पूरी तरह बिक गए थे. ये इस बात का सबूत है कि भारत में लोग अब अनुभवों पर खर्च करने लगे हैं. इस महीने पेश हुए बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मिडिल क्लास की जेब ढीली करने के लिए टैक्स में छूट दी. 12 लाख रुपये तक कमाई करने वालों को अब इनकम टैक्स नहीं देना होगा जिससे 92% सैलरीड लोगों को राहत मिलेगी. लेकिन इसके बावजूद भारत की खपत चीन से 13 साल पीछे है. 2023 में भारत में प्रति व्यक्ति खर्च 1,493 डॉलर था, जबकि चीन में 2010 में ही ये 1,597 डॉलर था.

माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में बढ़ता कर्ज का बोझ
उधर, माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में भी हालात ठीक नहीं हैं. दिसंबर 2024 तक इस सेक्टर के नॉन-परफॉर्मिंग असेट्स (NPA) 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. ये अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है और कुल लोन का 13% है. NPA का मतलब है वो लोन जो लोग वापस नहीं कर पा रहे. गरीब लोग माइक्रोफाइनेंस से छोटे-छोटे लोन लेते हैं, क्योंकि उन्हें बैंक से आसानी से लोन नहीं मिलता. लेकिन अब उनकी लोन चुकाने की ताकत कम हो रही है. आंकड़ों के मुताबिक 91 से 180 दिन का बकाया लोन कुल आउटस्टैंडिंग का 3.3 फीसदी है, जबकि 180 दिन से ज्यादा बकाया लोन 9.7% है. माइक्रोफाइनेंस को लेकर अब संस्थान भी सतर्कता बरत रहे हैं, क्योंकि उन्हें NPA अभी और बढ़ने की आशंका है.

क्या है माइक्रोफाइनेंस और NPA?
माइक्रोफाइनेंस का मतलब है गरीब परिवारों को बिना गारंटी के लोन देना. इन परिवारों की सालाना कमाई 3 लाख रुपये से कम होती है. ज्यादातर महिलाएं इन लोन का इस्तेमाल करती हैं. लेकिन ज्यादा लोन देने की होड़ में हालात बिगड़ गए हैं. बंधन बैंक, इंडसइंड, IDFC फर्स्ट जैसे बैंकों के NPA बढ़ गए हैं. बंधन बैंक के 56,120 करोड़ रुपये के लोन में से 7.3% NPA हो चुके हैं. वहीं NPA वो कर्ज है जिसकी कोई भी किश्त 180 दिनों तक चुकाने में लेनदार असफल हो जाता है. इसके बाद बैंकों को इस तरह के लोन को NPA में डालना होता है. हालांकि इस लोन की वसूली की कोशिश जारी रहती है और कई बार ये पूरा या आंशिक तौर पर वापस मिल जाता है.

लोन डिस्ट्रीब्यूशन में भारी गिरावट
अक्टूबर- दिसंबर 2024 तिमाही में माइक्रोफाइनेंस लोन का डिस्ट्रीब्यूशन 35.8% घटकर 22,091 करोड़ रुपये रह गया. माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के पास कुल 1,42,695 करोड़ रुपये के असेट्स हैं जो 2023 से 0.1% कम हैं. छोटे बैंकों में ESAF और उत्कर्ष को नुकसान हुआ, जबकि इक्विटास, जन, सूर्योदय और उज्जीवन के मुनाफे में 18% से 67% तक की गिरावट आई. ऐसे में माना जा रहा है कि अगर सरकार ने सख्त कदम नहीं उठाए, तो ये हालात और बिगड़ सकते हैं. खासकर गरीब और मिडिल क्लास पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है.

RBI ने लोन पर रिस्क वेट घटाया
इसी बीच RBI ने बिजनेस लोन पर जोखिम वेट 125% से घटाकर 75% कर दिया है, जिससे बैंकों को राहत मिलेगी. छोटे बैंकों को हो रहे नुकसान को देखते हुए इस नियम में बदलाव से इन्हें फायदा मिल सकता है. इस पूरे हालात से साफ है कि भारत की खपत ग्रोथ संतुलित नहीं है. एक तरफ जहां अमीर और अमीर हो रहे हैं, वहीं गरीब और गरीब जिसके लिए आने वाले समय में सरकार को बड़े कदम उठाने होंगे जिससे आर्थिक असमानता कम हो सके.

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