अलग-अलग सूबों में फसल उत्पादन की अलग लागत आने के बावजूद केंद्र सरकार देश भर के लिए एक ही न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी तय कर देती है. हालांकि, कोई भी राज्य एमएसपी के ऊपर जरूरत के हिसाब से बोनस दे सकता है, लेकिन केंद्र सरकार इस तरह की किसी भी कोशिश को ठीक नहीं मानती. बहरहाल, मुद्दा यह है कि केंद्र सरकार तो एमएसपी एक ही तय करती है लेकिन क्या राज्य सरकारें इसके लिए अपनी ओर से कोई प्रस्ताव भेजती हैं? हां, बिल्कुल ऐसा ही है. अब सवाल यह उठता है कि किस राज्य ने धान, गेहूं जैसी प्रमुख फसलों के लिए केंद्र सरकार को कितनी एमएसपी का प्रस्ताव दिया है.
केंद्र ने खरीफ मार्केटिंग सीजन 2024-25 के लिए धान की एमएसपी 2300 रुपये क्विंटल तय की थी. जबकि उस साल के लिए महाराष्ट्र ने धान की एमएसपी 4661 रुपये प्रति क्विंटल मांगी थी. केरल ने 3690 रुपये और कर्नाटक सरकार ने 3426 रुपये प्रति क्विंटल एमएसपी की मांग की थी. उत्तर प्रदेश ने 3000 और बिहार सरकार ने 3201 रुपये की डिमांड की थी. तेलंगाना ने 5428 और उत्तर प्रदेश सरकार ने 3000 रुपये प्रति क्विंटल की एमएसपी मांगी थी.
केंद्र ने कितनी मानी लागत
राज्य सरकारों ने केंद्र से अपने सूबे के लिए चाहे जितनी एमएसपी का प्रस्ताव दिया हो लेकिन, उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. केंद्र ने देश में धान की संपूर्ण लागत (C2 Cost) महज 2008 रुपये प्रति क्विंटल मानी. ताज्जुब यह है कि सी-2 कॉस्ट बताने के बावजूद केंद्र सरकार ने उसे माना नहीं. सरकार ने A2+FL फार्मूले के आधार पर धान की उत्पादन लागत को प्रति क्विंटल 1533 रुपये बताया और उस पर न्यूनतम 50 फीसदी मुनाफा जोड़कर 2300 रुपये एमएसपी तय कर दी. राज्यों के प्रस्तावों पर इतनी कटौती के बावजूद कुछ लोगों को लगता है कि एमएसपी की लीगल गारंटी मिलने के बाद महंगाई बढ़ जाएगी.
महाराष्ट्र ने मांगी 4461 रुपये एमएसपी
गुजरात सरकार ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर एक अप्रैल 2025 से शुरू हुए रबी मार्केटिंग सीजन 2025-26 के लिए गेहूं की एमएसपी 4050 रुपये प्रति क्विंटल तय करने की मांग उठाई थी. पश्चिम बंगाल ने 3350 और महाराष्ट्र ने गेहूं की एमएसपी भी 4461 रुपये मांगी. जबकि केंद्र सरकार ने एमएसपी 2425 रुपये तय की है. यानी इन सूबों की मांग के मुकाबले एमएसपी बहुत कम है.
राज्यों से आई सिफारिशों को दरकिनार करते हुए केंद्र सरकार ने एक औसत निकालकर यह बताया कि गेहूं की संपूर्ण लागत (C2 Cost) 1720 रुपये प्रति क्विंटल आई है. हालांकि सरकार ने सी-2 कॉस्ट के आधार पर एमएसपी तय नहीं किया. सरकार ने गेहूं की A2+FL फार्मूले के आधार पर उत्पादन लागत 1182 रुपये ही मानी. इस पर 105 फीसदी का मुनाफा देकर पूरे देश के लिए 2425 रुपये प्रति क्विंटल की एमएसपी तय कर दी. अब यहां सवाल यह है कि कैसे औसत दाम तय करने से किसानों को लाभ हो सकता है?
किन राज्यों ने नहीं दिया प्रस्ताव
कृषि लागत एवं मूल्य आयोग के अनुसार रबी मार्केटिंग सीजन 2025-26 के दौरान गेहूं की एमएसपी के लिए आठ राज्यों ने सिफारिश दी है, लेकिन चार सूबों ने कोई प्रस्ताव नहीं दिया. इनमें गेहूं का सबसे बड़ा उत्पादक उत्तर प्रदेश भी शामिल है. इसके अलावा राजस्थान, हरियाणा और छत्तीसगढ़ से भी गेहूं की एमएसपी को लेकर केंद्र सरकार को कोई सिफारिश या सुझाव नहीं दिया गया है.
काम नहीं आती राज्यों की सिफारिश
ऐसा नहीं है कि राज्य सरकारें हर साल केंद्र से अपने सूबे में लागत के हिसाब से एमएसपी नहीं मांगतीं. लेकिन उनकी सिफारिशों को दरकिनार करके एक औसत निकालकर यह बताया जाता है कि देश में किस फसल की कितनी लागत है और उस आधार पर एमएसपी कितनी होगी. इस तरह वर्षों से कुछ राज्य एमएसपी का मजा ले रहे हैं तो कुछ के लिए एमएसपी एक बेमानी शब्द बनकर रह गया है.