नक्सलवाद से बागवानी तक: औरंगाबाद का दुर्गी गांव बना अमरूद का हब!

औरंगाबाद  : औरंगाबाद और गया जिले के सीमा पर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में बसा दुलारे पंचायत का दुर्गी गांव कभी नक्सलवाद का ठीकाना हुआ करता था, आज उस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बागवानी कर लोग आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे है और रोजगार मुहैया करा रहे है.
समय की बदलती करवटों के साथ अब लोग समाज की मुख्य धारा में लौट रहे है. कुटुंबा प्रखंड क्षेत्र के दधपा बिगहा गांव निवासी नरेश कुमार ने आंध्र प्रदेश और बंगाल के किसानों को बड़े पैमाने पर अमरूद की बागवानी करते देख प्रेरणा ली और वर्ष 2022 में देव प्रखंड के दुलारे पंचायत अंतर्गत दुर्गी गांव में 65 एकड़ जमीन एग्रीमेंट करा कर बागवानी शुरू की.
आज वे उक्त पंचायत के 150 एकड़ जमीन पर अमरूद की बागवानी कर रहे है. वहीं मदनपुर पंचायत के चिरैया गांव में एक सौ एकड़ जमीन अनुबंध पर लेकर बागवानी की तैयारी कर रहे है. उन्होंने बताया कि कोलकाता से 40 हजार पौधे मंगवा कर बागवानी शुरू की थी.अमरूद की बागवानी में नुकसान न के बराबर है. कभी-कभी पौधों और फल में कीड़े लग जाते है जिनकी दवा स्थानीय बाजार के बीज भंडार पर आसानी से उपलब्ध हो जाती है.
अमरूद के पौधों में साल भर में दो बार फल लगते है. एक पौधे में लगभग पच्चीस से तीस किलो अमरुद निकल जाता है जिसे समय और मांग के अनुरूप व्यापारी होलसेल रेट में पच्चीस से तीस रुपए प्रति किलोग्राम के दर से खरीद लेते है. फलों को बेचने के लिए उन्हें बाजार जाने की जरूरत नहीं होती है. व्यापारी ऑर्डर बुक करते हैं और समय पर आकर फल ले जाते है. उन्होंने बताया कि एक पौधा दस से पंद्रह साल तक फल देता है.
इस बागवानी में बार-बार पैसे लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है. एक बार पूंजी लगाकर लंबे समय तक मुनाफा कमाया जा सकता है.  बेरोजगार लोगों के लिए पैसे कमाने का बेहतर विकल्प है. नरेश कुमार से प्रेरणा लेकर कई लोगों ने उस क्षेत्र में बागवानी शुरू कर दिया है.
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