छत्रपति शिवाजी ने मुगलों से कितने किले जीते? जानें कहां तक लहराया मराठा परचम…

मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज की वीरता की कहानियों से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं. उनकी सूझबूझ और युद्ध तकनीक की जितनी सराहना की जाए कम है. अपने इन्हीं गुणों के बल पर उन्होंने दक्षिण में मराठा साम्राज्य का विस्तार किया तो औरंगजेब जैसे मुगल बादशाह को नाकों चने चबवा दिए. 3 अप्रैल को शिवाजी की पुण्यतिथि पर आइए जान लेते हैं कि उन्होंने कौन-कौन से किले जीते और मुगलों से कितने किले छीने थे? उन्होंने कहां-कहां मराठा झंडा लहराया था?

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शिवाजी राजे भोंसले का जन्म 19 फरवरी 1630 ईस्वी को शिवनेरी किले में हुआ था. उनके पिता शाहजी भोंसले पुणे के जागीरदार थे. बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह के यहां उच्च अधिकारी भी थे. शिवाजी की मां जीजाबाई भी वीरता की मिसाल थीं. उन्होंने शिवाजी को खुद प्रशासन और युद्ध कौशल की शिक्षा दी थी.

यह साल 1645 की बात है. आदिलशाह की सेना ने पुणे में स्थित तोरणा किले पर हमला कर दिया. तब शिवाजी की उम्र केवल 15 साल थी. उन्होंने इस युद्ध में हिस्सा लिया और जीत में अहम भूमिका निभाई. तोरणा किला मराठों के अधीन आ गया. इसके बाद जो उनका सैन्य अभियान शुरू हुआ वह आजीवन चलता रहा.

रायगढ़ में आदिलशाही सेना ने मुंह की खाई

इसके अगले ही साल यानी 1646 ईस्वी में मराठों और आदिलशाह की सेना के बीच एक और युद्ध हुआ. इसे रायगढ़ के युद्ध के नाम से जाना जाता है. इसमें आदिलशाह की सेना की अगुवाई जनरल मुल्ला अली ने की थी. शिवाजी ने इस युद्ध में आदिलशाही सल्तनत के जनरल को हरा कर रायगढ़ किले पर कब्जा कर लिया. इस जीत के साथ ही शिवाजी की पहचान एक कुशल नेतृत्वकर्ता के रूप में हो गई. उनको इस युद्ध ने मराठा संग्राम का अगुवा बना दिया. इस जीत के बाद ही शिवाजी ने रायगढ़ के किले को अपनी राजधानी बनाया और यहीं से मराठा साम्राज्य के गठन और विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए.

ये महत्वपूर्ण किले शिवाजी ने जीते

वैसे इस लड़ाई से पहले भी शिवाजी ने कई छोटे-छोटे किले जीते थे. उन सबमें रायगढ़ का किला जीतना सबसे महत्वपूर्ण था. उन्होंने जो अन्य महत्वपूर्ण किले जीते उनमें रायगढ़ के अलावा राजगढ़, प्रतापगढ़, शिवनेरी, लोहागढ़, सिंधुदुर्ग, सिंहगढ़, जुन्नार और पुरंदर शामिल हैं. तोरणा तो शिवाजी द्वारा जीता गया पहला किला है ही.

पुरंदर की संधि में हाथ से निकले 23 किले

यह साल 1665 ईस्वी की बात है. औरंगजेब के बहकावे में आकर आमेर के महाराजा जय सिंह प्रथम ने शिवाजी महाराज पर हमला कर दिया. इसमें अपनी सेना पिछड़ती देख शिवाजी संधि के लिए तैयार हो गए. उधर, औरंगजेब ने भी दोस्ती का नाटक करते हुए उनको संधि के लिए तैयार कर लिया. यह संधि पुरंदर के किले में शिवाजी महाराज और आमेर के महाराजा जय सिंह प्रथम के बीच की गई. इस संधि के कारण शिवाजी को 23 किले मुगलों के हवाले करने पड़े.

इसके बदले उनको मराठों की स्वाधीनता बरकरार रखने की अनुमति मिल गई. यही नहीं, मुगल बादशाह औरंजेब ने भी शिवाजी को स्वतंत्र शासक की मान्यता दे दी. इससे मराठा साम्राज्य को अपनी स्वाधीनता का अधिकार मिल गया. ऐसे में भले शिवाजी के हाथ से किले चले गए पर स्वाधीनता बरकरार रही.

आगरा में कैद करना औरंगजेब के लिए बना मुसीबत

हालांकि, शिवाजी महाराज से ये किले ज्यादा दिनों तक दूर नहीं रहे. दरअसल, इस संधि के बाद ही औरंगजेब ने शिवाजी को आगरा बुलाया. उनके साथ बड़े बेटे संभाजी भी थे. वहां औरंगजेब ने धोखे से दोनों को कैद कर लिया पर ज्यादा दिनों तक अपनी कैद में नहीं रख पाया. शिवाजी और संभाजी महाराज औरंगजेब की कैद से भाग निकले. साथ ही शिवाजी यह भी समझ गए कि पुरंदर में औरंगजेब ने केवल दोस्ती का दिखावा किया था.

मुगलों से छीने ये किले

इसलिए आगरा से अपने राज्य वापस पहुंचने के बाद शिवाजी ने चुन-चुन कर औरंगजेब के कब्जे वाले दक्कन के इलाकों पर हमला शुरू कर दिया. अगले पांच सालों में एक-एक कर अपने वे सभी किले मुगलों से छीन लिए, जो पुरंदर की संधि के कारण उन्हें देने पड़े थे. यही नहीं, शिवाजी मुगल बादशाह औरंगजेब के दक्षिण में विजय के सपने के सामने अड़ गए और आजीवन उसको दक्षिण पर कब्जा करने में सफलता नहीं मिली.

शिवाजी ने मुगलों से जो किले छीने उनमें सिंहगढ़, लोहगढ़ आदि शामिल हैं. सिंहगढ़ किले को जीतने में अहम भूमिका निभाने वाली तानाजी इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे. तभी शिवाजी ने कहा था कि गढ़ आया पर सिंह गया.

शिवाजी का परचम लहराया

इन सब विजय अभियानों के बाद शिवाजी को कई उपाधियों से नवाजा गया. इसके बाद 6 जून 1674 को उन्हें रायगढ़ किले में छत्रपति की उपाधि से नवाजा गया और वह मराठा साम्राज्य के सर्वमान्य अगुवा बन गए. शिवाजी ने रायगढ़ को अपनी राजधानी बनाया ही था, राजगढ़, प्रतापगढ़, सिंधु दुर्ग, जन्म स्थान शिवनेरी से लेकर लोहगढ़, सिंहगढ़ होते हुए तमिलनाडु के जिंजी तक मराठा परचम फहराया. साल्हेर, खंडेरी, सुवर्णदुर्ग, पन्हाला, विजयदुर्ग आदि इलाकों में भी मराठा झंडा गर्व से लहराया.

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