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IIT दिल्ली ने तैयार किया ऐसा टूल, जो मिनटों में बनाएगा लैंडस्लाइड का सटीक मैप

बाढ़ और भूस्खलन के कारण देश के कई हिस्सों में जनजीवन प्रभावित हो रहा है. इसे कम करने के लिए आईआईटी दिल्ली के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ताओं ने सैटलाइट डेटा का उपयोग करके भूस्खलन का मानचित्रण करने के लिए एक क्लाउड कंप्यूटिंग और मशीन लर्निंग आधारित टूल एमएल-कैस्केड विकसित किया है. यह टूल भूस्खलन की घटनाओं का अनुमान लगाने और यह बताने में सक्षम होगा कि कौन से स्थान पर भूस्खलन होगा. इस मॉडल को बनाने में सैटलाइट के माध्यम से अलग-अलग जगहों के पेड़ -पौधों और मिट्टी की डेटा को इकठ्ठा करके तैयार किया गया है.

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रिसर्च को लैंडस्लाइड्स में प्रकाशित

सिविल इंजीनियरिंग विभाग के हाइड्रोसेंस लैब के पीएचडी छात्र निर्देश कुमार शर्मा और प्रो. मानबेंद्र सहारिया द्वारा लिखित इस शोध को प्रतिष्ठित जर्नल ‘लैंडस्लाइड्स’ में प्रकाशित किया गया है. सामान्यत: भूस्खलन का मानचित्रण सैटलाइट इमेजरी पर मैन्युअल रूप से किया जाता था, जो काफी महंगा, असटीक और समय-साध्य होता था. इसके साथ ही बड़े और दूरस्थ क्षेत्रों में फील्ड सर्वेक्षण और भूवैज्ञानिक डेटा संग्रहण संभव नहीं होता. मौजूदा सरल मॉडल, जो वनस्पति सूचकांक के थ्रेशोल्ड का उपयोग करते हैं, वे कम वनस्पति वाले क्षेत्रों में असफल हो जाते हैं. भूस्खलन की समस्या को बाइनरी इमेज सेगमेंटेशन समस्या के रूप में देखा गया है. मॉडल विकसित करने के लिए 19 फीचर्स का उपयोग किया गया है.

हिमालय और पश्चिमी घाट पर केस स्टडी

प्रो. मनबेंद्र ने बताया कि इस उपकरण को हजारों भूस्खलनों पर व्यापक रूप से मान्य किया गया है, जिसमें हिमालय और पश्चिमी घाट में दो प्रमुख घटनाओं को केस स्टडी के रूप में प्रस्तुत किया गया है. अधिकांश भूस्खलन दूरस्थ स्थानों में होते हैं, और एक व्यापक इन्वेंटरी विकसित करने के लिए महत्वपूर्ण विशेषज्ञता, समय और प्रयास की आवश्यकता होती है. इस उपकरण का उपयोग अब आईआईटी दिल्ली के शोधकर्ता राष्ट्रीय ऐतिहासिक भूस्खलन इन्वेंटरी विकसित करने के लिए कर रहे हैं, जो भूस्खलन की प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों के विकास में अमूल्य सिद्ध होगा. साथ ही, इसका उपयोग भविष्य में बाढ़, वनों की कटाई, रेत खनन और अन्य पर्यावरणीय चुनौतियों के मानचित्रण में भी किया जा सकता है.

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