क्या बिना रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट के वैध है शादी? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सुनाया ये फैसला

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने तलाक से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि केवल विवाह का रजिस्ट्रेशन न होने से हिंदू विवाह को अमान्य नहीं ठहराया जा सकता. यह फैसला आजमगढ़ के रहने वाले सुनील दुबे की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया. जस्टिस मनीष कुमार निगम की एकल पीठ ने कहा कि फैमिली कोर्ट को आपसी सहमति से तलाक की याचिका के निपटारे में विवाह रजिस्ट्रेशन प्रमाणपत्र की अनिवार्यता नहीं थोपनी चाहिए. फैमिली कोर्ट के उस निर्णय को चुनौती दी गई थी जिसमें तलाक की प्रक्रिया के दौरान विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने से छूट देने की याचिका खारिज कर दी गई थी.

कोर्ट ने साफ किया कि इस न्यायालय, सुप्रीम कोर्ट और अन्य उच्च न्यायालयों द्वारा स्थापित विधिक सिद्धांतों के अनुसार, विवाह प्रमाणित करने के लिए केवल रजिस्ट्रेशन प्रमाणपत्र ही सबूत है. हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 8 की उपधारा 5 के अनुसार, अगर विवाह का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है तो भी वह विवाह अमान्य नहीं माना जाएगा. कोर्ट ने यह भी साफ किया कि विवाह रजिस्ट्रेशन के लिए नियम बनाना राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है. इसमें हिंदू विवाह रजिस्टर बनाए रखना भी शामिल है ताकि विवाह से संबंधित विवरण दर्ज किए जा सकें. ऐसे रजिस्ट्रेशन का मुख्य उद्देश्य केवल विवाह का प्रमाण देने की सुविधा प्रदान करना है.

सुनील दुबे याचिका और उच्च न्यायालय का फैसला

याचिकाकर्ता सुनील दुबे और उनकी पत्नी मीनाक्षी (प्रतिवादी) ने 23 अक्टूबर, 2024 को हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13 (बी) के अंतर्गत आपसी सहमति से तलाक के लिए याचिका दायर की थी. याचिका न्यायालय में लंबित रहने के दौरान फैमिली कोर्ट द्वारा 4 जुलाई, 2025 को यह निर्देश जारी किया गया कि मैरिज सर्टिफिकेट को 29 जुलाई, 2025 तक न्यायालय में प्रस्तुत किया जाए. याचिकाकर्ता द्वारा एक आवेदन देकर यह कहा गया कि उसके पास विवाह का रजिस्ट्रेशन प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं है और हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह का पंजीकरण कराना अनिवार्य नहीं है. इस आधार पर याचिकाकर्ता ने प्रमाणपत्र देने से छूट दिए जाने जाने का आग्रह किया. याचिकाकर्ता ने कहा कि आवेदन का प्रतिवादी पक्ष द्वारा समर्थन किया गया है.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानूनों और 1956 के नियम 3 के उप-नियम (क) को ध्यान में रखते हुए फैमिली कोर्ट चीफ जस्टिस द्वारा मैरिज सर्टिफिकेट पेश करने पर जो जोर दिया गया है वो अनुचित है. इसलिए लोअर कोर्ट द्वारा पारित आदेश विधिसंगत नहीं ठहराया जा सकता और इसे रद्द किया जाना ही सही होगा. इस आधार पर याचिका स्वीकार की जाती है और 31.07.2025 को पारित आदेश को निरस्त किया जाता है. आपसी सहमति से तलाक की याचिका 2024 से लंबित है, इसलिए इसपर जल्दी विचार कर निर्णय लिया जाए.

31 जुलाई को कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के तहत दायर किसी भी कार्यवाही के साथ विवाह प्रमाणपत्र लगाना करना अनिवार्य है जैसा कि हिंदू विवाह और तलाक नियम 1956 के नियम 3(ए) में निर्धारित किया गया है. याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट के सामने यह दलील दी कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 8 केवल विवाह के पंजीकरण की प्रक्रिया को बताती है और पंजीकरण न होने की स्थिति में विवाह की वैधता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता.

वकील ने यह दलील दी कि याचिकाकर्ता की शादी 27 जून 2010 को हुई थी जो कि उत्तर प्रदेश विवाह पंजीकरण नियम 2017 के लागू होने से पहले का है इसलिए ये नियम लागू होने से पहले हुई शादी पर लागू नहीं होंगे.

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