रीवा : माइनिंग ट्रक एसोसिएशन की समस्याएं और सरकार की अनदेखी अनिल मिश्रा, माइनिंग ट्रक एसोसिएशन के अध्यक्ष ने ट्रक मालिकों की समस्याएं सरकार और जनता के सामने मीडिया के माध्यम से राखी है.
अनिल मिश्रा ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से सरकार द्वारा ग्लोबल कंपनियों के माध्यम से बालू के रेट लगातार बढ़ाए जा रहे हैं. इस वजह से हम ट्रक मालिकों को न केवल गाड़ियों को बाजार में लाने में कठिनाई हो रही है, बल्कि उचित मूल्य पर माल बेचने में भी परेशानी हो रही है. आज ही, लगभग दो घंटे पहले, रेत के दाम फिर से बढ़ा दिए गए, और यह वृद्धि इतनी अधिक है कि हम सही दाम पर अपना माल नहीं बेच पा रहे हैं.
रेट निर्धारण में अनियमितता
टीपी (ट्रांजिट पास) का रेट तय होता है, लेकिन इसके बावजूद कीमतों में बार-बार बदलाव किया जा रहा है. इनका कोई स्थायी मूल्य निर्धारण नहीं है. जब मन आता है, 5 या 10 रुपये की वृद्धि कर दी जाती है. यह मामूली बढ़ोतरी नहीं है, बल्कि लगातार बढ़ते दामों के कारण ट्रक मालिकों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है.
ट्रक मालिकों की आर्थिक परेशानी
इस बढ़ती कीमत का असर सिर्फ व्यवसाय पर ही नहीं, बल्कि ट्रक मालिकों के जीवनयापन पर भी पड़ रहा है. – गाड़ी की ईएमआई चुकाना मुश्किल हो गया है. – ड्राइवरों का वेतन देना कठिन हो रहा है. अन्य खर्चों का प्रबंधन करना मुश्किल हो गया है.
सरकार के पास इस प्रक्रिया का कोई ठोस सिस्टम नहीं है। जब मांग कम होती है, तो दाम घटा दिए जाते हैं, और जब मांग अधिक होती है, तो बालू की कीमतें बढ़ा दी जाती हैं.
बिना बिल बालू की बिक्री और जीएसटी चोरी
सबसे बड़ी समस्या यह है कि इतनी ऊंची कीमत वसूलने के बावजूद हमें कोई वैध बिल नहीं दिया जाता. – न तो हमें जीएसटी बिल मिलता है. – न ही स्टोरेज के लिए ट्रांजिट पास (टीपी) दिया जाता है. – कई बार सरकार से अनुरोध किया गया, लेकिन कोई ठोस जवाब नहीं मिला. यह स्पष्ट है कि जीएसटी की चोरी की जा रही है, और हम जल्द ही इसकी शिकायत करेंगे.
गरीबों को सस्ती बालू कैसे मिलेगी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी गरीबों को पक्का मकान दिलाने का लक्ष्य रखा है. लेकिन जब बालू इतनी महंगी होगी, तो गरीब अपने घर कैसे बना पाएंगे- एक ट्रक रेत को रीवा लाने में 70,000 तक का खर्च आ रहा है. अगर इतनी महंगी रेत होगी, तो निर्माण कार्य कैसे होगा?
रेट और बिलिंग की अनियमितता
हम यह जानना चाहते हैं कि सरकार ग्लोबल कंपनियों को कितने फीट के हिसाब से रेत देती है और हमें कितने फीट के हिसाब से? – हमें कोई निश्चित जानकारी नहीं दी जाती. – पैसे लेने के बाद ही भुगतान की प्रक्रिया होती है। – अगर हमारे पास 800 फीट का टोकन है, तो हमें वर्तमान रेट के हिसाब से भुगतान करना पड़ता है. – हमें रॉयल्टी दी जाती है, ईटीपी कटती है, लेकिन जीएसटी बिल नहीं दिया जाता. – टीपी में केवल गाड़ी का नंबर और माल की मात्रा दर्शाई जाती है, लेकिन कोई मूल्य जानकारी नहीं होती.
ट्रांसपोर्ट परमिट की वास्तविकता
सरकार द्वारा जारी किए गए टीपी केवल ट्रांसपोर्ट परमिट हैं, जो माल की आवाजाही के लिए आवश्यक होते हैं. – इसमें खरीदी गई रेत की कीमत नहीं होती. – इसमें सिर्फ वाहन संख्या और मात्रा का विवरण होता है.
सरकार और कंपनियों की मिलीभगत
अब सवाल यह उठता है कि किन कंपनियों के पास रेत खनन का ठेका है और क्या वे सरकार की मिलीभगत से काम कर रही हैं?
हमारी मांग है कि सरकार इस मुद्दे पर ध्यान दे और
1. रेत की कीमतें स्थिर करे.
2. जीएसटी बिल जारी करे.
3. ट्रक मालिकों को स्टोरेज के लिए उचित टीपी प्रदान करे।
4. माइनिंग और ट्रांसपोर्ट सेक्टर में पारदर्शिता लाए.
अगर जल्द ही इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो हम आंदोलन करने को मजबूर होंगे.