उपराष्ट्रपति पद के लिए INDIA गठबंधन के प्रत्याशी बी. सुदर्शन रेड्डी की उम्मीदवारी का विरोध छत्तीसगढ़ के नक्सल पीड़ित आदिवासियों ने खुलकर किया है। बस्तर शांति समिति के बैनर तले पीड़ित आदिवासी रायपुर पहुंचे और देशभर के सांसदों को पत्र लिखकर अपील की कि वे रेड्डी का समर्थन न करें। उनका कहना है कि रेड्डी के फैसलों ने बस्तर की शांति छीन ली और नक्सलवाद को बढ़ावा दिया।
पीड़ितों का आरोप है कि रेड्डी ने 2011 में ‘सलवा जुडूम’ आंदोलन पर प्रतिबंध लगाकर माओवादी संगठनों को फिर से ताकतवर बना दिया। सलवा जुडूम के दौरान नक्सलियों की पकड़ कमजोर हो रही थी, लेकिन प्रतिबंध लगने के बाद उन्होंने फिर से जमीन मजबूत कर ली। आदिवासियों का कहना है कि उस समय उनकी राय तक नहीं ली गई और नतीजा यह हुआ कि हजारों परिवारों को हिंसा, हत्याओं और विस्थापन का सामना करना पड़ा।
कई पीड़ितों ने मीडिया से बातचीत में अपने दर्दनाक अनुभव साझा किए। सियाराम रामटेके ने बताया कि नक्सली हमले में वे दिव्यांग हो गए और आज तक उस दर्द को झेल रहे हैं। वहीं, केदारनाथ कश्यप ने कहा कि सलवा जुडूम के बंद होने के बाद नक्सलियों ने उनके भाई की हत्या कर दी। शहीद मोहन उइके की पत्नी ने रोते हुए कहा कि माओवादी एम्बुश में उनके पति मारे गए और उस समय उनकी बच्ची महज तीन महीने की थी। महादेव दूधु ने बताया कि बस पर नक्सलियों के हमले में उन्होंने अपना एक पैर खो दिया, जबकि 32 लोगों की मौत हो गई थी।
बस्तर शांति समिति के जयराम ने कहा कि जिनके फैसलों से बस्तर की धरती नरक बनी, ऐसे व्यक्ति को देश का उपराष्ट्रपति नहीं बनाया जाना चाहिए। समिति के मंगऊ राम कावड़े ने बताया कि सांसदों को पत्र लिखकर साफ कर दिया गया है कि वे रेड्डी का समर्थन न करें।
नक्सल पीड़ित आदिवासियों का कहना है कि रेड्डी की उम्मीदवारी उनके जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है और यदि संसद उन्हें समर्थन देती है तो यह बस्तर के हजारों परिवारों के साथ अन्याय होगा।